Samadhi Pada – Patanjali Yog Sutra

  1. Samadhi Pada – on enlightenment
  2. Sadhana Pada – about practice
  3. Vibhuti Pada –about results
  4. Kaivalya Pada –about liberation

Samadhi Pada – on enlightenment

योगश्चित्तवृत्तिनिरोधः

चित्त अर्थात् अन्त:करण की वृत्तियों का निरोध सर्वथा रुक जाना योग है ।

चित्त क्या होता है-सरल अर्थों में कहें तो चित्त का अर्थ होता है जहां हमारे विचार जन्मते हैं, बनते हैं और जमे रहते हैं संस्कारों के रूप में।

हमारे भीतर उठने वाली विचार रूपी तरंगों या मन के क्रियाकलाप को जो कि पांच प्रकार से विभाजित है उसे वृत्तियाँ कहते हैं।

निरोध अर्थात स्वयं रुक जाने की स्थिति

तदा द्रष्टु: स्वरुपेSवस्थानम्

उस समय (निरोध के अवस्था में) द्रष्टा की अपने ही रूप अर्थात् चेतन-मात्र में स्थिति हो जाती है ।

इस जगत में तीन सत्ताएं हैं।

  • जीवात्मा
  • प्रकृति
  • परमात्मा

द्रष्टा का अर्थ होता है देखने वाला (The Seer)। आत्मा / जीवात्माअर्थात पुरुष को द्रष्टा क्यों कहा गया है! 

योगस्थ होने से पुरुष तब अपने स्वरूप को पा लेता है।

वृत्तिसारूप्यम् इतरत्र 

दूसरे समय में अर्थात् वृत्तियों के निरोध से भिन्न अवस्था में द्रष्टा का वृत्ति के सदृश स्वरूप होता है ।

note : 2 type of State – In yoga, not in Yoga

वृत्तयः पञ्चतय्यः क्लिष्टाSक्लिष्टा:

उपर्युक्त वृत्तियाँ पाँच प्रकार की होती हैं – क्लेशयुक्त और क्लेशशून्य भेदों वाली ।

There are five kinds of modification( vrittayah) which are either painful or not painful.

1-“जो वृत्ति साधक को स्वयं के स्वरूप एवं परमात्मा की ओर उन्मुख करती है, वह वृत्ति अक्लिष्ट है अर्थात उसे रोकना नहीं अपितु प्रयत्नपूर्वक बढ़ाना चाहिए।”

2-“जो वृत्ति साधक को स्वयं के स्वरूप एवं परमात्मा से विमुख करती हो, वह क्लिष्ट वृत्ति कहलाती है अर्थात ऐसी वृत्तियों को व्यवहारकाल में बलपूर्वक रोकने, नष्ट करने का निरंतर अभ्यास करना चाहिए।”

प्रमाणविपर्ययविकल्पनिद्रास्मृतयः

  1. pramanna – Right Knowledge
    • प्रत्यक्ष – प्रत्यक्ष
    • अनुमान – अप्रत्यक्ष पदार्थ का ज्ञान (और)
    • आगमाः – वेद, शास्त्र तथा आप्त-पुरुष के वचन
  2. viparyaya – indiscrimination
  3. vikalpa – verbal misconception
  4. nidra – sleep
  5. smritayah – memory

अभ्यासवैराग्याभ्यां तन्निरोधः

भ्यास – अभ्यास और वैराग्य से उन चित्तवृत्तियों का निरोध होता है।

practice and non-attachment.

तत्र स्थितौ यत्नोऽभ्यास:
स तु दीर्घकालनैरन्तर्यसत्कारासेवितो दृढभूमिः

चित्तकी स्थिरता के लिए जो प्रयत्न करना है, वह अभ्यास है। रन्तु बहुत समय तक निरन्तर और श्रद्धा के साथ सेवन किया हुआ वह अभ्यास दृढ़ अवस्था वाला हो जाता है।

दृष्टानुश्रविकविषयवितृष्णस्य वशीकारसंज्ञा वैराग्यम्
तत्परं पुरुषख्यातेर्गुणवैतृष्ण्यम्

2 type of vairgya
खे हुए और सुने हुए विषयों में सर्वथा तृष्णारहित है, उसका वैराग्य अपर-वैराग्य नाम वाला है। पुरुष के असल स्वरूप के ज्ञान से जो प्रकृति के गुणों में तृष्णा रहित हो जाना है – वह पर-वैराग्य है।

वितर्कविचारानन्दास्मितारूपानुगमात् संप्रज्ञातः
वितर्क, विचार, आनंद और अस्मिता – इन चारों के सम्बन्ध से युक्त चित्तवृत्ति का समाधान – सम्प्रज्ञात समाधि है।

सम्प्रज्ञात समाधि का उपाय अपर वैराग्य है तो महर्षि पतंजलि इस सूत्र से अपर वैराग्य से किस प्रकार सम्प्रज्ञात समाधि लगती है वह बता रहे हैं |

वितर्क सम्प्रज्ञात समाधि के आलंबन स्थूल विषय में होती है अर्थात ध्यान के समय हम स्थूल विषय को आलंबन बनाकर समाधिस्थ जब होते हैं तो उसे ही वितर्क सम्प्रज्ञात समाधि कहते हैं। पांच महाभूत निम्न हैं- आकाश , पृथिवी, जल, अग्नि, वायु

विचार अनुगत सम्प्रज्ञात समाधि: जब साधक ध्यान के समय सूक्ष्म तन्मात्राओं का आलंबन लेता है तो इस प्रकार की समाधि को विचारानुगत सम्प्रज्ञात समाधि कहते हैं।

पांच तन्मात्राएँ निम्न हैं-

  • गन्ध
  • रस
  • रूप
  • स्पर्श
  • शब्द

आनंदानुगत सम्प्रज्ञात समाधि: सांख्य के अनुसार इंद्रियां सत्व प्रधान होती हैं। वितर्क और विचार से भिन्न यह समाधि की स्थिति है आंनद की। यहां स्थूल और सूक्ष्म विषय पर आलंबन नहीं किया जाता है अपितु इंद्रियों के सत्त्व स्वरूप में एकाग्रता की जाती है। इंद्रियों के सात्विक सुख की अनुभूति से ही आनंदानुगत सम्प्रज्ञात समाधि कहते हैं।

अंतिम और चौथी सम्प्रज्ञात समाधि है अस्मितानुगत समाधि।
जब जीवात्मा सभी जड़ पदार्थो को स्वयं से भिन्न मानकर और समझकर अपने स्वरुप को पृथक जान लेता है और स्वयं के स्वरुप में चित्त को एकाग्र करता है तब उस स्थिति को अस्मितानुगत सम्प्रज्ञात समाधि कहते हैं।

विरामप्रत्ययाभ्यासपूर्व: संस्कारशेषोSन्यः
विराम-प्रत्यय का अभ्यास जिसकी पूर्व-अवस्था है और जिसमें चित्त का स्वरूप ‘संस्कार’ मात्र ही शेष रह जाता है, वह योग अन्य है अर्थात् असम्प्रज्ञात समाधि है ।

notes 

आईये इसे ठीक से समझते हैं- एक साधक योग के अनुष्ठान यम, नियम आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि रूप इस अष्टांग योग को अत्यंत श्रद्धा पूर्वक साधना कर रहा है। योग के स्वरूप का उसको अच्छे से सैद्धान्तिक ज्ञान है। वह वृत्तियों के पांच रूपों को भी जानता है और क्लिष्ट अक्लिष्ट भेद से जीवन में क्लिष्ट वृत्तियों को रोकने की भी साधना साथ साथ करता है।

वह यह भी जानता है कि ये पांच प्रकार की क्लिष्ट वृत्तियाँ उसके साधना मार्ग की प्रमुख बाधाएं हैं और निरंतर अभ्यास और वैराग्य से वह इन्हें समाप्त कर सकता है, ऐसा उसे पूर्ण विश्वास है। समाधि के दो भेद सम्प्रज्ञात और असम्प्रज्ञात हैं यह जानते हुए वह वितर्क, विचार, आनंद और अस्मिता के क्रम से सम्प्रज्ञात समाधि का अनुभव करता है।

जब तीव्र साधना करते करते हुए, पर वैराग्य का बार बार अभ्यास करते हुए और अभ्यास की भी बारंबार आवृत्ति करते हुए एक ऐसी स्थिति में पहुंच जाता है जब उसके मन से सब प्रकार के विचार कुछ समय के लिए समाप्त हो जाते हैं तो उस स्थिति को ही असम्प्रज्ञात समाधि कहते हैं। लेकिन इस स्थिति में कुछ संस्कार शेष रह जाते हैं उन्हें हम निरोध के संस्कार कहते हैं अर्थात रोकने के संस्कार। थोड़े समय के बाद जैसे ही किसी साधक की असम्प्रज्ञात समाधि खंडित होती है तो उसे स्मरण आता है कि वह एक ऐसी स्थिति में था जहां सबकुछ शून्य सा हो गया था, कोई विचार नहीं था बस एक अनुभूति थी। यह जो अनुभव है वह बिना संस्कार और संस्कार जन्य स्मृति के बिना नहीं हो सकता था। अतः समाधि के समय जो शून्यता का संस्कार है वह शेष रह जाता है। इसलिए सब प्रकार के विचार रुक जाने के बाद केवल संस्कार शेष की स्थिति को ही “असम्प्रज्ञात समाधि” कहते हैं।

असम्प्रज्ञात समाधि 2 प्रकार की होती है।

  • उपायप्रत्यय
  • भवप्रत्यय

उपायप्रत्यय असम्प्रज्ञात समाधि विदेह एवं प्रकृतिलय योगियों से भिन्न योगियों की होती है और भवप्रत्यय असम्प्रज्ञात समाधि विदेह और प्रकृतिलय योगियों की होती है।

भव का अर्थ यहां संसार से है और प्रत्यय का दार्शनिक अर्थ होता है यथार्त ज्ञान अर्थात संसार के यथार्त ज्ञान से जो समाधि लगती है उसे भवप्रत्यय असम्प्रज्ञात समाधि कहते हैं और यह विदेह और प्रकृतिलय योगियों की लगती है।

विदेह योगी-जो देह में रहते हुए देहाभिमान, देहभान से पार हो गए हों, केवल व्यवहार के लिए शरीर का प्रयोग करते हों, जो स्वयं को अकर्ता मानकर परमात्मा को ही सर्वकर्ता मानते हों, देह को नश्वर मानकर एक ईश्वर की प्रार्थना और उपासना करते हों वे विदेह कहलाते हैं।

प्रकृतिलय योगी- जैसा कि मध्य मध्य में हमने बताया कि प्रकृति तीन गुणों से मिलकर बनी हैं और वे तीन गुण हैं।

  • सत्त्व
  • रजस और
  • तमस

जो योगी उपरोक्त तीन प्रकृति और इनसे उत्पन्न महत्तत्त्व फिर अहंकार और अहंकार से उत्पन्न तन्मात्राएँ के स्वरूप को ठीक ठीक जानकर, समझकर और अंततः इनमें दोषदर्शन कर केवल शाश्वत तत्त्व उस एक परमेश्वर को भजते हैं उन्हें प्रकृतिलय योगी कहते हैं।

इनसे भिन्न योगियों की समाधि कैसे लगती है जिसे उपायप्रत्यय कहते हैं।

महर्षि कहते हैं कि ऐसे योगियों की उपायप्रत्यय असम्प्रज्ञात समाधि के लिए उनके जीवन में पांच तत्त्वों की महती आवश्यकता होती है।

  • श्रद्धा अर्थात असंशय पूर्वक पूर्ण समर्पण
  • वीर्य अर्थात संकल्प पूर्वक उत्साह
  • स्मृति अर्थात जिनके जीवन में भव नहीं भवानी का स्मरण हो
  • समाधि अर्थात समाधान, एकाग्रता से जिनका जीवन चलता हो
  • प्रज्ञा अर्थात प्रकृष्ट बुद्धि से जो सही गलत के भेद को जानकर सहजता से सत्कर्म करते हों

Speed of Samadhi
तीव्रसंवेगानाम् आसन्न: 
मृदुमध्याधिमात्रत्वात् ततोSपि विशेषः

ईश्वरप्रणिधानाद्वा

जिनकी साधन की गति तीव्र है, उनकी निर्बीज-समाधि शीघ्र सिद्ध होती है

साधन की मात्रा हलकी, मध्यम और उच्च मात्रा के अनुसार तीव्र संवेगवालों में भी काल का भेद हो जाता है ।

साधक की स्वयं की अभीप्सा- सबकुछ समाधि के अनुकूल हो लेकिन साधक की स्वयं की अभीप्सा या चाहना में न्यूनता हो तो भी समाधि लगने में समय अधिक लग सकता है या साधक की अभीप्सा अत्यंत बढ़ी हुई हो और बांकी सबकुछ अनुकूल भी न हो तो समाधि अति शीघ्र भी लग सकती है|

अथवा ईश्वर के प्रति भक्ति से भी निर्बीज-समाधि की सिद्धि शीघ्र हो सकती है ।

About God

क्लेशकर्मविपाकाशयैरपरामृष्ट: पुरुषविशेष ईश्वरः क्लेश, कर्म, विपाक, आशय – इन चारों के संबंध से रहित है तथा जो समस्त पुरुषों से उत्तम है, वह ईश्वर है ।

क्लेश (अविद्यादि पञ्च क्लेश), कर्म (तीन प्रकार के कर्म), विपाक (कर्मों का फल), आशय (समस्त वासनाएं) से जो सर्वथा पृथक है ऐसे पुरुष विशेष को ईश्वर कहा गया है ।

तत्र निरतिशयं सर्वज्ञबीजम् उस ईश्वर में सर्वज्ञत्व का बीज अर्थात् ज्ञान निरतिशय है ।
पूर्वेषाम् अपि गुरुः कालेनानवच्छेदात् वह ईश्वर पूर्व उत्पन्न गुरुगणों का भी गुरु है, क्योंकि वह काल से सीमित नहीं है अर्थात् सर्वकाल में विद्यमान है ।
तस्य वाचकः प्रणवः उस ईश्वर का वाचक (नाम) प्रणव अर्थात् ॐ कार है ।
तज्जपस्तदर्थभावनम् उस ॐ कार का जप और उस ईश्वर के अर्थस्वरूप का ध्यान करना अर्थात् पुनः पुन: चिन्तन करना चाहिए ।
तत्र निरतिशयं सर्वज्ञबीजम् उस ईश्वर में सर्वज्ञत्व का बीज अर्थात् ज्ञान निरतिशय है ।
पूर्वेषाम् अपि गुरुः कालेनानवच्छेदात् वह ईश्वर पूर्व उत्पन्न गुरुगणों का भी गुरु है, क्योंकि वह काल से सीमित नहीं है अर्थात् सर्वकाल में विद्यमान है ।
तस्य वाचकः प्रणवः उस ईश्वर का वाचक (नाम) प्रणव अर्थात् ॐ कार है ।
तज्जपस्तदर्थभावनम् उस ॐ कार का जप और उस ईश्वर के अर्थस्वरूप का ध्यान करना अर्थात् पुनः पुन: चिन्तन करना चाहिए ।
ततः प्रत्यक्चेतनाधिगमोऽप्यन्तरायाभावश्च उस ईश्वर प्रणिधान से विध्नों का अभाव और अन्तरात्मा के स्वरूप की प्राप्ति अर्थात् साक्षात्कार भी हो जाता है।

Obstacle of yoga

योग मार्ग की 9 बाधाएं एवं 4 उप-बाधाएं

व्याधिस्त्यानसंशयप्रमादालस्याविरति भ्रान्तिदर्शनालब्धभूमिकत्वानवस्थितत्वानि चित्तविक्षेपास्तेऽन्तरायाः
व्याधि (रोग), मानसिक जड़ता, संदेह, प्रमाद, आलस्य, विषयतृष्णा, मिथ्या अनुभव, समाधि नहीं लग पाना , समाधि लाभ होने पर भी अधिक देर समाधि में नहीं ठहर पाना – ये चित्त के नौ क्षोभ या योग के मूल विघ्न हैं । 

  • व्याधि (रोग)
  • स्त्यान ( इच्छा होने पर भी योग का अनुष्ठान न करना)
  • संशय ( योग से मुक्ति मिलेगी या नहीं, मैं योग कर पाऊंगा या नहीं आदि इस प्रकार के संशययुक्त चित्त)
  • प्रमाद ( मन के स्तर पर योग न करने की इच्छा)
  • आलस्य ( शरीर के स्तर पर भारीपन होने के कारण योग न करना)
  • अविरति ( भोगों के प्रति आसक्ति बने रहना, वैराग्य का अभाव)
  • भ्रांतिदर्शन (विपरीत ज्ञान, उल्टा ज्ञान या मिथ्या ज्ञान; योगमार्ग पर चलने के लिए बताए गए साधनों एवं उनके लाभ के बारे में मिथ्याज्ञान होना)
  • अलब्ध-भूमिकत्व ( योग के किसी भी स्तर को न पाना, योग प्रांरम्भ करना फिर छोड़ देना )
  • अनवस्थितत्व ( योग की उच्चतम अवस्था समाधि को पाकर भी चित्त का अधिक देर तक उसमें न ठहर पाना, समाधि का टूट जाना)

दुःखदौर्मनस्याङ्गमेजयत्वश्वासप्रश्वासा विक्षेपसहभुवः
दुख, मन खराब होना, अंगमेजयत्व, श्वास और प्रश्वास – ये पाँच विघ्न विक्षेपों के साथ-साथ होनेवाले हैं।

  • दुख
    • आध्यात्मिक दुःख -जो दुख स्वयं के कारणों से प्राप्त होता है।
    • अधिभौतिक दुःख – जो दुख हमें स्वयं से भिन्न अन्य जीवों से प्राप्त होता है।
    • आधिदैविक दुःख – जो दुख हमें प्रकृति से प्राप्त होता है।
  • दौर्मनस्य
    • जब व्यक्ति कोई इच्छा करता है और उसकी वह इच्छा पूर्ति नहीं होती है तब उसके मन में एक क्षोभ पैदा हो जाता है, एक कसक रह जाती है जिसे योग दर्शन की भाषा में दौर्मनस्य कहा गया है। 
  • अंगमेजयत्व
    • संयमित जीवन शैली, आहार, भोग वासनाओं में अत्यधिक लिप्तता के कारण व्यक्ति के अंगों में एक कम्पन होने लग जाता है जो उसे असहज करता है | 
  • श्वासप्रश्वास
    • श्वास लेने में और छोड़ने को व्यक्ति अनियमित एवं अनियंत्रित गति भी एक विक्षेप है जो ९ बाधाओं का साइड इफ़ेक्ट है | यदि मानसिक स्थिति में किसी भी कारण से ठहराव न होकर चंचलता है तो इसका सीधा प्रभाव हमारे प्राणों पर पड़ता है और हमारे प्राणों को एक अनियमित गति की ओर ले जाता है | 

Solution

तत्प्रतिषेधार्थमेकतत्त्वाभ्यासः उन विक्षेपों को दूर करने के लिए एक तत्त्व का अभ्यास करना चाहिए ।

उन विक्षेपों एवं सह विक्षेपों को रोकने के लिए अथवा सर्वथा हटाने के लिए एकतत्त्व का अभ्यास करना चाहिए अर्थात शास्त्र द्वारा निश्चित की गई किसी एक पद्धति विशेष, तत्त्वविशेष का निरन्तर अभ्यास करना चाहिए।

मैत्रीकरुणामुदितोपेक्षणां सुखदुःखपुण्यापुण्यविषयाणां भावनातश्चित्तप्रसादनम्
सुखी, दु:खी, पुण्यात्मा और पापात्मा के विषयों में क्रमशः मित्रता, दया, आनंद और उपेक्षा की भावना से चित्त प्रसन्न और स्वच्छ होता है ।

सूत्र कहता है कि इस संसार में चार प्रकार के लोगों से आपका सामना होगा और उन चार प्रकार के लोगों से आपको एक निश्चित दृष्टि को ध्यान में रखकर व्यवहार करना होगा ।

  • सुखी प्रतीत होते व्यक्ति के विषय में मित्रता का भाव रखना होगा ।
  • दुखी प्रतीत होते व्यक्ति के विषय में दया का भाव रखना होगा ।
  • जो पुण्यात्मा हैं उनके प्रति हर्ष का भाव रखना चाहिए ।
  • जो पापात्मा हैं पाप में लगे हुए हैं उनके प्रति मन में उपेक्षा का भाव रखना चाहिए ।

प्रच्छर्दनविधारणाभ्यां वा प्राणस्य
अथवा प्राणवायुको बारम्बार बाहर निकालने और रोकने से भी चित्त स्थिर होता है । 

इस सूत्र में दो शब्द विशेष रूप से कहे गए हैं ।
प्रच्छर्दन: फेफड़ों में रहने वाली प्राणवायु को वेगपूर्वक बाहर फेंकने को प्रच्छर्धन कहते हैं।
विधारण: वेगपूर्वक बाहर की ओर फेंकी प्राणवायु को बाहर ही रोक देने की प्रक्रिया को विधारण कहते हैं।

आगे के 5 और सूत्रों में चित्त की स्थिति बनाने या चित्त को एकाग्राभिमुख करने की बात महर्षि करेंगे।

विषयवती वा प्रवृत्तिरुत्पन्ना मनसः स्थितिनिबन्धिनी ||1.35||

विषयवाली प्रवृत्ति उत्पन्न होकर वह भी मन की स्थिति को बाँधने वाली होती है । 

पांच विषयों (रुप,रस,गन्ध, स्पर्श एवं शब्द) वाली उत्पन्न हुई प्रवृत्ति भी मन को एकाग्र एवं स्थिरता प्रदान करने वाली होती है जिससे मन शांत एवं निर्मल हो जाता है।

विशोका वा ज्योतिष्मती ||1.36||

थवा शोकरहित ज्योतिष्मति प्रवृत्ति (भी मन की स्थिति को बाँधने वाली होती है) ।

शोक से रहित एवं प्रकाश पूर्ण प्रवृत्ति उत्पन्न करने से भी साधक का मन स्थिरता को प्राप्त होता है।

इस प्रवृत्ति में सत्त्व गुण अधिक मात्रा में रहता है; रजो गुण एवं तमो गुण शून्य रहता है। रजो गुण एवं तमो गुण रहित होने से ही इसे विशोका कहा जाता है। शोक रजो गुण एवं तमो गुण से ही उत्पन्न होता है।

वीतरागविषयं वा चित्तम् ||1.37||

अथवा राग रहित विषयवाला महापुरुषों का चित्त (मन की स्थिति को बाँधने वाला होता है) ।

जिन योगियों का चित्त अर्थात अंतःकरण राग मुक्त हो गया है ऐसे योगियों के चित्त का आश्रय लेने से, उनके चित्त में एकाग्रता बनाने से भी साधक का चित्त निर्मल एवं शांत हो जाता है।साधक को इस स्थिति तक पहुँचना होगा जैसे वे वीतराग महापुरुष के चित्त वाला ही हो गया है और उसे वह सब अनुभव हो रहा है जैसा उन वीतराग महापुरुष को महसूस होता हो। जब साधक इस प्रकार से वीतराग चित्त को अनुभव करने लग जायेगा तो स्वतः ही उसका भी चित्त तदाकार हो शांत एवं निर्मलता को प्राप्त हो जाएगा। 

स्वप्ननिद्राज्ञानालम्बनं वा ||1.38||

स्वप्न और निद्रा के ज्ञान का अवलम्बन करनेवाला चित्त भी स्थिर हो सकता है । 

स्वप्नज्ञनित एवं निद्रा से जनित ज्ञान का आलंबन लेने वाला चित्त भी मन को स्थिरता एवं प्रशांतता देने वाला होता है।

शास्त्रों में तीन प्रमुख अवस्थाओं को माना गया है।

  • जाग्रत
  • स्वप्न
  • सुषुप्ति

स्वप्न , सुषुप्ति अनुभूति का आलंबन लेकर मन को एकाग्र करे तो वह भी शांति को प्राप्त कर सकता है और यह आलंबन भी मन को सम्यक रूप से बांधने वाला होता है।

यथाभिमतध्यानाद्वा ||1.39||

जिसको जो अभिमत हो, उसके ध्यान से; भी मन स्थिर हो जाता है ।

परमाणु परममहत्त्वान्तोऽस्य वशीकारः

(पूर्वोक्त उपायों में स्थिर हुए चित्त) का परमाणु से लेकर परम वृहत् पदार्थों में वशीकार हो जाता है

मन को शहर, निर्मल एवं स्थिर करने के उपरोक्त बतलाए गए उपायों, विधियों का अनुष्ठान करने से सूक्ष्म से सूक्ष्म तथा बड़े से बड़े या सबसे बढ़कर महान पदार्थ भी जान लिया जाता है अर्थात् वश में कर लिया जाता है।

जब एक साधक का चित्त बिना किसी बाधा के सूक्ष्मतम अर्थात् परमाणु में एवं बृहत विषय “आकाश” स्थिर होने लग जाता है तब ऐसे चित्त को परम वशीकार प्राप्त हो जाता है।

क्षीणवृत्तेरभिजातस्येव मणेर्ग्रहीतृग्रहणग्राह्येषु तत्स्थतदञ्जनतासमापत्तिः

जिसकी समस्त बाह्य वृत्तियाँ क्षीण हो चुकी हैं, ऐसे स्फटिक मणि की भाँति निर्मल चित्त का; जो ग्रहीता अर्थात् आत्मा ग्रहण अर्थात् अंत:करण और इंद्रियां तथा ग्राह्य अर्थात् पंचभूत और विषयों – में एकाग्र स्थित होकर उसी विषय के स्वरूप को प्राप्त हो जाना सम्प्रज्ञात समाधि अर्थात् चित्त का विषय के साथ तदाकार हो जाना है ।

इसी प्रकार जब चित्त भी इतना ही स्वच्छ एवं निर्मलता की दशा को उपलब्ध हो जाता है तो उसके सम्मुख जो विषय आता है वह तदाकार (उसी विषय जैसा हो जाता है) होकर उसका स्वरूप दिखाने लग जाता है।

यहां एक बात ध्यान देने योग्य है- यह स्थिति सम्प्रज्ञात समाधि की ही स्थिति है। जिसे समापत्ति के नाम से कहा गया है।

तत्र शब्दार्थज्ञानविकल्पैः संकीर्णा सवितर्का समापत्तिः

उन समापत्तियों में शब्द, अर्थ, ज्ञान – इन तीनों के विकल्पों से मिली हुई समापत्ति अर्थात् समाधि सवितर्क अर्थात् वितर्कयुक्त कहलाती है । 

समापत्ति के चार भेदों में से जो एक सवितर्क समापत्ति है, वह शब्द, अर्थ एवं ज्ञान इस प्रकार तीन भेदों से मिली हुई है इसे ही सवितर्का समापत्ति कहते हैं।

पहले शब्द सुनाई देता है, फिर उसका जो विशेष अर्थ है उसका हमें बोध होता है और तत्पश्चात उस शब्द का यही अर्थ होता है यह निश्चयात्मक ज्ञान हमें होता है।

शब्द-अर्थ एवं ज्ञान को अलग अलग साक्षात्कार करता है । योगी की इस अवस्था को योग की भाषा में सवितर्का समापत्ति कहते हैं।

अब आगे के सूत्र में निर्वितर्का समापत्ति की परिभाषा कहेंगे।

स्मृतिपरिशुद्धौ स्वरूपशून्येवार्थमात्रनिर्भासा निर्वितर्का

स्मृति के शुद्ध अर्थात् आगम और अनुमान के शब्द और ज्ञान से रहित हो जाने पर अपने रूप से शून्य हुई जैसी केवल ध्येय अर्थ मात्र के स्वरूप को प्रत्यक्ष कराने वाली चित्त की स्थिति ही; निर्वितर्क समाधि है । 

जिसको अभी तक निर्वितर्का समापत्ति अनुभव में नहीं आई है उसके लिए तो इसकी कल्पना करना भी कठिन है लेकिन समझ के स्तर पर थोड़े से प्रयास से निर्वितर्का समापत्ति की स्थिति को मानसिक रूप से अनुभव किया जा सकता है न कि आत्मिक रूप से | इस संसार में जो कुछ है उसके सम्पूर्ण अस्तित्त्व की अभिव्यक्ति के लिए तीन सत्ताओं का होना अनिवार्य है|

शब्द- उसका कोई नाम होना चाहिये|

  • अर्थ- जिसको शब्द से कहा जा रहा है उसका कोई अर्थ होना चाहिए|
  • ज्ञान-जिसको शब्द से कहा जा रहा है और जिसका अर्थ हो, उसका वैसा ही ज्ञान अनुभव में आना चाहिए|

ऐसी स्थिति में शब्द और उसका ज्ञान का भी भास नहीं होता बस केवल अर्थ भासता है| इस स्थिति को मानसिक स्तर पर अनुमान करने में भी साधक को बड़ी कठिनाई होती है और इसके विषय में विचार करना मात्र ही बड़ा रहस्यमयी प्रतीत होता है | यह एक विलक्षण स्थिति है और निरंतर योग के अभ्यास से ही यह स्थिति सिद्ध हो सकती है|

एतयैव सविचारा निर्विचारा च सूक्ष्मविषया व्याख्याता

इन अर्थात् पूवोक्त सवितर्क और निर्वितर्क समाधियों के वर्णन से ही सूक्ष्म विषयों में की जानेवाली सविचार और निर्विचार समाधि का भी वर्णन कर दिया गया है ।

जिस प्रकार से ऊपर के दो सूत्रों में हमने सवितर्क और निर्वितर्क को समझाया है उसी के आधार पर क्रमश: अर्थात् सवितर्क की तरह सविचार समापत्ति को और निर्वितर्क समापत्ति की तरह निर्विचार को समझ लेना चाहिए। सवितर्क और निर्वितर्क समापत्ति में स्थूल भूत एकाग्रता के विषय होते हैं जबकि सविचार एवं निर्विचार समापत्ति में सूक्ष्म भूत विषय बनते हैं।

स्थूलभूत या भौतिक पदार्थो में जिस प्रकार शब्द, अर्थ एवं ज्ञान इन तीन के पृथक-पृथक होने पर भी जो मिली हुई सवितर्क समापत्ति होती है, उसी प्रकार सूक्ष्मभूत परमाणुओं में शब्द, अर्थ एवं ज्ञान से मिश्रित सविचार समापत्ति होती है। सामान्य काल में तो शब्द,अर्थ एवं ज्ञान हमको पृथक-पृथक अनुभव में नहीं आते हैं लेकिन योगमार्ग पर आगे बढ़ चुके योगी, इन सूक्ष्म परमाणुओं को भी प्रथम तो शब्द, अर्थ एवं ज्ञान के विकल्प से अलग अलग देखना प्रांरम्भ कर देते हैं फिर धीरे धीरे शब्द और ज्ञान से शून्य हुई सी केवल चित्तवृत्ति योगी को केवल अर्थ मात्र का भान कराती है।

इस प्रकार सम्प्रज्ञात समाधि के चार भेदों की व्याख्या यहां पर समाप्त हुई।

स्थूलभूत एवं सूक्ष्मभूत की बात यहाँ उपरोक्त तीन सूत्रों में हुई तो शिष्यों ने महर्षि से जिज्ञासा की- आप जो सूक्ष्मभूत की बात यहां कर रहे हैं, उसकी सीमा कहाँ तक है? योगी कितनी सूक्ष्मता में जाकर निर्विचार या सविचार समापत्ति प्राप्त कर सकता है?

उसके उत्तर में ही अग्रिम सूत्र है।

सूक्ष्मविषयत्वं चालिङ्गपर्यवसानम्

सूक्ष्मविषयत्वं चालिङ्गपर्यवसानम्

सूक्ष्म विषयता (अर्थात जड़ पदार्थों की सूक्ष्मता) तो मूल प्रकृति पर्यन्त अर्थात् मूल प्रकृति तक रहती है।

सवितर्क और निर्वितर्क समापत्ति में स्थूल भूत एकाग्रता के विषय होते हैं जबकि सविचार एवं निर्विचार समापत्ति में सूक्ष्म भूत विषय बनते है अतः यह प्रश्न उठता है कि यह सूक्ष्मता कहाँ तक संभव है, अतः महर्षि कहते हैं कि यदि जड़ पदार्थों में अणु के सूक्ष्म विषय को देखेंगे यह संबंधित तन्मात्रा तक जाएगी और यदि उझसे भी सूक्ष्म खोजेंगे तो सभी तन्मात्राओं का भी सूक्ष्म विषय “अहंकार” तत्त्व होगा। अहंकार का भी सूक्ष्म विषय “महत्तत्त्व” होगा। और अंत में जब महत्तत्त्व का भी सूक्ष्म विषय खोजेंगे तो इसकी समाप्ति ” अलिंग अर्थात मूल प्रकृति” पर होगी। मूल प्रकृति से परे जड़ पदार्थो की सूक्ष्म स्थिति नहीं होती है।

मूल प्रकृत्ति से शेष तत्त्वों की उत्पत्ति का क्रम इस प्रकार है—प्रकृति से महत्तत्व (बुद्धि), महत्तत्व से अहंकार, अहंकार से ग्यारह इंद्रियाँ (पाँच ज्ञानेंद्रियाँ, पाँच कर्मेंद्रियाँ और मन) और पाँच तन्मात्र, पाँच तन्मात्रों से पाँच महाभूत (पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश) । जब प्रलय काल होता है तब ये सब तत्त्व फिर प्रकृति में क्रमशः विलीन हो जाते हैं।

पुरुष और मूल प्रकृति दो ऐसे तत्त्व हैं जिनका कोई उपादान कारण नहीं है अर्थात ये दो तत्त्व किसी से भी नहीं बने हैं, ये नित्य तत्त्व हैं। इन्हें बनाने वाला कोई भी नहीं है। यह जो कुछ दृश्य जगत (संसार) जिस भी रूप में दिख रहा है या अनुभव हो रहा है इसका मुख्य कारण मूल प्रकृति है। ईश्वर इस जगत रचना में सहायक कारण (निमित्त कारण) है।

ता एव सबीजः समाधिः

ये पूर्वोक्त सभी ही सबीज समाधि हैं ।

यहां महर्षि ने चार प्रकार से लगने वाली ( सवितर्का, निर्वतर्का, सविचारा एवं निर्विचारा) समाधि को सबीज या सालम्बन समाधि कहा है। जिसका अर्थ हुआ कि इस प्रकार की समाधि लगने में कोई बाह्य कारण का आलंबन रहता है और जितनी देर तक यह बाहरी कारण उपस्थित रहता है उतनी देर तक ही समाधि का अनुभव साधक कर सकता है। बाहरी कारण के हट जाने पर समाधि खंडित हो जाएगी।

महर्षि द्वारा समाधि को सबीज लिखने से यह स्पष्ट होता है कि कोई निर्बीज समाधि भी होनी चाहिए जो निरालंबन समाधि होगी और किसी भी प्रकार से बाहरी कारणों पर आश्रित नहीं होगी।

आगे आने वाले सूत्रों में निर्बीज समाधि के विषय में विस्तार के साथ पढ़ेंगे, लेकिन अभी यह समझते हैं कि ये चारों समापत्तियाँ किस प्रकार से सबीज अर्थात बाह्य कारण वाली हैं।

पूर्व सूत्रों में भी यह समझाया जा चुका है कि सवितर्का और निर्वतर्का समापत्ति (समाधि) स्थूल विषयों (पृथ्वी, घड़े, वृक्ष, फूल आदि) में होती है और सविचारा और निर्विचारा समाधि सूक्ष्म विषयों जैसे तन्मात्राओं, इंद्रियों एवं उनके विषयों में या फिर मन, अहंकार, बुद्धि या आत्मा में लगाई जाती है।

इस प्रकार इन समापत्तियाँ में सभी बाहरी आलंबन होने से यह सबीज समाधि कही जाती हैं।

निर्विचारवैशारद्येऽध्यात्मप्रसादः

निर्विचार समाधि की निर्मल होने पर अध्यात्म प्रसाद प्राप्त होता है अर्थात् चित्त की स्थिति दृढ़ हो जाती है। 

निर्विचार समाधि का अभ्यास करते हुए जब उसमें सिद्धि हो जाती है तब फलस्वरूप साधक को जो वस्तु जैसी है वैसा ही उसका स्वरूप दिखाई देने लगता है।

सरल भाषा में समझें तो निर्विचार समाधि के सिद्धि के फलस्वरूप जो अध्यात्म का प्रसाद मिलता है वह है- बुद्धि की शुद्धि और शुद्ध बुद्धि से जो वस्तु जैसी है वैसे ही साधक को दिखती है और वैसा ही ठीक ठीक स्वरूप समझ में भी आता है।

अध्यात्मप्रसाद पाने से साधक को परिस्तिथि से ऊपर उठने की कला आ जाती है और उसे अपने आस पास ही नहीं स्वयं के भीतर भी घटित हो रही घटनाओं का पता चलने लगता है। उसकी बुद्धि में सही निश्चय करने की शक्ति उत्पन्न हो जाती है।

जिस प्रकार किसी ऊंचे पर्वत पर स्थित व्यक्ति को शिखर से नीचे देखने पर अन्य व्यक्ति, स्थिति स्पष्टता से दिखाई देती है और उसे विस्तृत दृष्टि मिलती है उसी प्रकार निर्विचार की सिद्धि स्वरूप निर्मल बुद्धि या प्रज्ञा की प्राप्ति साधक को प्राप्त होती है।

ऋतम्भरा तत्र प्रज्ञा ||1.48||

उस अध्यात्म-प्रसाद से बुद्धि ऋतम्भरा होती है ।